अच्छे दिन
सुनाता हु एक कहानी मै अपने अच्छे दिन की
विकास होगा एक दिन उस विश्वास के मातम की
जब चुनाव प्रचार हुए तब हम थे भूके नंगे
अबसे तो लगता हैं वो हि अच्छे दिन थे
जो आये थे भिकमंगे वो सत्ता मे जा बैठे
हम आपस की जाति मे आग लगाकर बैठे
जो कुछ भी हैं अपना सबकुछ बेचकर् खाओ
फिर मन की बात सुनाकर जख्मों पे मिर्च लगाओ
इस मुल्क मे जाने कैसी हो रही हैं बर्बादी
वो सोचते होंगे हमने क्या इसलिए की आजादी
परेशान हो गयी जनता चंद मुट्ठीभर चोरों से
जब अपने हि हो दुश्मन तो डर कैसा ओरों से
क्या बात हुई पुरानी के अच्छे दिन आऐंगे
उम्मीद रहेगी कबतक जब हम मर जाएंगे
ये हैं आधी कहानी बाकि बाद सुनाता हु
अपने खर्च उठाने हैं अब मै काम पे जाता हु
......देवेंद्र
No comments:
Post a Comment